अतुल कोठारी जी का बीज मंत्र
दूरदर्शिता और मिशन
इस देश की जनता का बहुत बड़ा भाग अंग्रेजी नहीं समझता।
देश में जो भाग अंग्रेजी भाषा को समझने वाला है वह न्यायालयों की अंग्रेजी भाषा को नहीं समझता। न्यायालय उनके लिए है और अगर यह न्यायालय इस देश की जनता के को न्याय देने के लिए है तो जनता की भाषा न्यायालय को नहीं आती और न्यायालय की भाषा जनता को नहीं आती। न्यायालय आज हैं अपने आप को चलाने के लिए और एक बहुत बड़े वर्ग को वकील के वर्क/ बिज़नेस देने के लिए। इस तरह के माहौल इस देश में पैदा हो रहे हैं जो व्यक्ति अदालतों में काम करना भी चाहो स्थानीय भाषा में वह भी नहीं कर सकता क्योंकि साधन ही नहीं है दिल्ली के किसी भी न्यायालय के अंदर हिंदी का आशुलिपिक नहीं है हिंदी का स्टेनोग्राफर हिंदी का टाइपिस्ट नहीं है वह एक विभाग है हिंदी प्रोत्साहन विभाग वहां आपको एक मिलेगा वह हिंदी को प्रोत्साहन देने के लिए यथास्थिति को बदलने के लिए बल की आवश्यकता अनुवाद करना हर एक के बस का रोग नहीं है अनुवाद करने के लिए आपको भाषा का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है अनुवाद भी एक कला है अपने आप में अनुवाद के कोर्स होते हैं डिग्रियां होती हैं और हमारे अदालतों में अनुवादक तो है नहीं J rajender prasad मातृभाषा के बिना जाने आप विद्वान तो कहला सकते हैं लेकिन अपनी आत्मा की पहचान आपको कभी नहीं होगी अगर अपनी आत्मा को पहचानना चाहते हैं तो आपको मातृभाषा अपनी मातृभाषा को नहीं जानते तो आप अपनी आत्मा को अपने वजूद को नहीं जानते हैं इस देश का कोई भी न्यायाधीश वकील या वकील एक भी नहीं होगा जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी हो उच्चतम न्यायालय के जज या उच्च न्यायालय के जज में से एक भी व्यक्ति नहीं होगा जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी होगी न्यायमूर्ति टी पी सिंह लखनऊ हर उच्च न्यायालय में सॉफ्टवेयर तैयार किया जा सकता है और जजमेंट का ट्रांसलेशन हिंदी और राज्य भाषाओं में हो सकता है एक साथ संविधान में जो 22 भाषाएं रखना ईस्ट है उन्हीं भाषाओं की बात होनी चाहिए जो शेडूल लैंग्वेज है संविधान में उस में अनुवाद होना चाहिए : न्यायमूर्ति राजेश टंडन जी सारे सिविल जज जितने निचली अदालतों की जज है सभी हिंदी भाषा में अपना अपना निर्णय दिया करें अतुल जी जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश से अलग हुआ है तो जो नियम उत्तर प्रदेश में लागू है वही उत्तराखंड में होने चाहिए
न्यायमूर्ति सर्वेश गुप्ता नैनीताल
अनुच्छेद 348 का जो subclause 2 है सब क्लास वन में कुछ भी होते हुए भी अगर राज्यपाल किसी प्रदेश के चाहे तो राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से अपने राज्य में अपनी भाषा का प्रयोग अधिकारिता कर सकते हैं ऑफिशियल पर्पस ऑफ द स्टेट के लिए प्रयोग किया जा सकेंगी राजभाषा परंतु यह क्लास जजमेंट बिक्री और ऑर्डर पर लागू नहीं होगा हिंदी में लिखें जजमेंट उच्च न्यायालय में मूर्ति बनने के लिए मान जाए अंग्रेजी में ही निर्णय उसके लिए भेजना अनिवार्य है अनिवार्य है अनिवार्य है और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसके पास अंग्रेजी का स्टेनोग्राफर कभी नहीं होता है उसके पास जो आशुलिपिक है जो भर्ती आशुलिपि हुई है वह हिंदी की ही होती है पहले हमें 348 में जो सब प्लस टू है उसका जो लास्ट तीन अक्षर है प्रोवाइडेड डिग्री जजमेंट और आर्डर को पूरी तरह से abolish करना पड़ेगा समाप्त करना पड़ेगा
माननीय विष्णु स्वरूप जी
हमें विधि शिक्षा में भारतीय भाषाओं का प्रयोग अधिक करना चाहिए उसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए विधाई कार्य में भाषा का प्रयोग भारतीय भाषाओं का प्रयोग tab प्रारंभ हो सकता है जब अंग्रेजी में विधायक कार्यों की मनाही हो : स्टेट बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया है उनको इसका नियम बनाना चाहिए की वकालत की सनद लेने के लिए अंग्रेजी के अलावा किसी एक भारतीय भाषा को उनका ज्ञान आवश्यक है हम नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी खोली पूरा अंग्रेजी के प्रभाव में खोली हैं वहां से निकलने वाले व्यक्ति को बहुत अच्छा समझा जाता है क्यों इस कारण से अंग्रेजी जानता है उसके लिए भी अनिवार्य होना चाहिए कि वह इंटर्नशिप करता है जैसे कि उसको एक भारतीय भाषा का ज्ञान है उसकी एक परीक्षा होनी चाहिए और तभी उसको ग्रेजुएशन का सर्टिफिकेट मिलना चाहिए कि वह किसी एक भारतीय भाषा में भी अपनी बात को कह सकता है शुरुआत जज से ही होगी जज कम होते हैं उनको अगर थोड़ा कष्ट हो जाए तो वह दूसरी भाषा सीखेंगे सारे हिंदुस्तान को अंग्रेजी भाषा सिखाने की बजाए जज अगर भारतीय भाषा सीखेंगे तो यह बहुत बड़ा परिवर्तन संभव हो सकेगा
अतुल जी
मैंने सुना है की कैबिनेट नोट है जिसमें यह लिखा गया है कि यह निर्णय करने से पहले उच्चतम न्यायालय के न्याय मूर्तियों की सलाह लेना आवश्यक है तो इसमें क्या रास्ता करना है जब चार राज्यों को ना कह दिया गया तब सरकार ने यही बहाना दिया था कि उच्चतम न्यायालय के न्याय मूर्तियों ने सहमति नहीं दी है मान लो एक कैबिनेट नोट है भी तो भी यह कैबिनेट नोट कानूनी है क्या इस को चुनौती दी जा सकती है क्या तो इसके बारे में देशभर के उच्च न्यायालयों में अनुच्छेद 348 के बारे में की अंग्रेजी के साथ-साथ वहां की राजभाषा को उपयोग किया जा सकता है इसके लिए क्या करें सब मिलकर
: न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली
अनुच्छेद 344 पढ़ेंगे तो माननीय राष्ट्रपति जी को यह अधिकार दिया गया है कि वह 5 साल के बाद या 10 साल के बाद एक कमीशन गठित कर सकते हैं उस कमीशन का क्या रोल है वह लिखा गया है कमीशन को यह भी अब तैयार होगा की वह धारा 348 के बारे में जिसमें सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट रुल्स ऑर्डर्स डिग्री जजमेंट के बारे में भी कंसीडर कर सकती है कमीशन उसके बारे में भी रिकमंडेशन कर सकता है क्लास फोर इस धारा की में यह प्रावधान है कि पार्लियामेंट्री कमेटी गठित होगी : सीपीसी में 2002 में जो अमेंडमेंट हुई जिसमें evidence by way of affidavit आया इससे ज्यादा नुकसान किसी अमेंडमेंट ने नहीं किया पहले जो गवाह आता था उसको सारा पता होता था वकील से ज्यादा उसको पता होता था उसके साथ क्या हुआ है वह क्या चाहता है क्या नहीं चाहता है वह एक नेचुरल स्टेटमेंट देता था और magistrate साहब लिखते थे या ahlmad लिखता था एक ऐप देखी है उसका नाम है मिस भी उस ऐप के जरिए क्या है कि 90 से ज्यादा भाषाएं को आप 10 भाषाओं में अनुवादित कर सकते हैं अगर म्यूजिक भी है तो उसको भी आप अनुवादित कर सकते हैं 7 प्रदेशों में भारत में नेपाली बोली जाती है लेकिन उसकी अपनी लिपि नहीं है लिपि देवनागरी है कश्मीरी है कश्मीरी की अपनी लिपि नहीं है वह संस्कृत और देवनागरी का मिश्रण है उसको शारदा बोलते हैं बहुत भाषाएं ऐसे हैं तो उन उन भाषाओं को हम देवनागरी में लिख सकते हैं मैं यह कहना चाहता हूं कि मैं इस इस क्षेत्र को अगर डेवलप करें तो ठीक रहेगा न्यायमूर्ति ज्ञानी इंदौर से लघुत्तम और महत्तम निकाले तो चार बातें आई हमारी मानसिकता नेतृत्व की भावना हम अपनी मातृभाषा का प्रयोग करें अंग्रेजी को अपने आप श्रेष्ठ माने हमारी इच्छा शक्ति की कमी यथास्थितिवाद